सुविचार

बुलंदी की उड़ान पर हो

बुलंदी की उड़ान पर हो तो जरा सब्र रखो
परिंदे बताते हैं कि आसमान में ठिकाने नहीं होते।

आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है,
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है ।…… वसीम बरेलवी

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है । …… बशीर बद्र

बुलंदी देर तक किस शख्श के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है…..मुनव्वर राना

बुलंदियों का गुमां जो करने लगता है
मुकद्दर भी उसका पलटने लगता है
करे तो कोई क्या करे गिला किसी से यहाँ
धूप में साया भी सिमटने लगता है
रिश्तों में अगर दूरियाँ बढ़ जायें तो
घर दीवार भी बँटने लगता है ।

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