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बुलंदी की उड़ान पर हो

बुलंदी पर शायरी, स्टेटस

बुलंदी की उड़ान पर हो तो जरा सब्र रखो
परिंदे बताते हैं कि आसमान में ठिकाने नहीं होते।

पाना है जो मुकाम वो मुकाम अभी बाकी है,
अभी तो आए हैं जमीन पर, अभी आसमान की उड़ान बाकी है ,
अभी तो सिर्फ सुना है लोगों ने मेरा नाम,
अब इस नाम की पहचान बनाना बाकी है ।

बुलंदी पर शायरी

किसी मुकाम को हासिल करना;
कोई बड़ी बात नहीं है,
उस मुकाम पर ठहरना बड़ी बात होती है।
कामयाबी हासिल करना बड़ी बात नहीं है
उसे बरक़रार रखना बड़ी बात होती है
चुनौतियों के इस दौर में सब बुलंदियों को छूने में लगे हैं
बुलंदियों को छूना बड़ी बात नहीं है
बुलंदियों पर टिकना बड़ी बात होती है।

बुलंदियाँ खुद ही तलाश लेगी तुम्हें,
बस मौका न छोड़ना
मुश्किलों में मुस्कुराने का।

उठो तो ऐसे उठो
कि फक्र हो बुलंदी को
झुको तो ऐसे झुको कि
वंदगी भी नाज़ करे।

बुलंदी पर शायरी

छुए तू हर बुलंदी को
ऐसा हुनर तू खास रखना
पाँव टिके हों सदा जमीं पर
भले नज़रों में आकाश रखना।

जो मजा अपनी पहचान बनाने में है
वो किसी की परछाई बनने में नहीं है ।

खोल दो पंख मेरे अभी और उड़ान बाकी है
ज़मी नहीं है मंज़िल मेरी अभी तो पूरा आसमान बाक़ी है,
लहरों की ख़ामोशी को समन्दर की बेबसी न समझो
जितनी गहराई अंदर है बाहर उतना तूफ़ान बाक़ी है ।

आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है,
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है ।…… वसीम बरेलवी

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है । …… बशीर बद्र

बुलंदी देर तक किस शख्श के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है…..मुनव्वर राना

बुलंदियों का गुमां जो करने लगता है
मुकद्दर भी उसका पलटने लगता है
करे तो कोई क्या करे गिला किसी से यहाँ
धूप में साया भी सिमटने लगता है
रिश्तों में अगर दूरियाँ बढ़ जायें तो
घर दीवार भी बँटने लगता है ।

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