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zindagi-ho ke myus na yun sham sa

ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए

हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिये
ज़िन्दगी भोर है सूरज-से निकलते रहिये

एक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो थक जायेंगे
धीरे-धीरे ही सही राह पे चलते रहिये

आपको ऊँचे जो उठना है तो आँसू  की तरह
दिल से आँखों की तरफ हँस के उछलते रहिये

शाम को गिरता है तो सुबह संभल जाता है
आप सूरज की तरह गिर के संभलते रहिये

प्यार से अच्छा नहीं कोई भी सांचा ऐ ‘कुँअर’
मोम बनके इसी सांचे में पिघलते रहिये

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ज़िन्दगी (Zindagi) पर चंद  लाइन और पढ़िये कुँअर बेचैन की कलम से –
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सबकी बात न माना कर
खुद को भी पहचाना कर

दुनिया से लड़ना है तो
अपनी ओर निशाना कर

या तो मुझसे आकर मिल
या मुझको दीवाना कर

बारिश में औरों पर भी
अपनी छतरी ताना कर

बाहर दिल की बात न ला
दिल को भी तहखाना कर

शहरों में हलचल ही रख
मत इनको वीराना कर

– कुँअर बेचैन

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