अध्यात्म

तू पुकारे और मैं सुन न पाऊँ

हे ईश्वर!
मुझे इतना नीचे भी मत गिराना
कि मैं पुकारूँ और तू सुन न पाये और
इतना ऊँचा भी मत उठाना कि
तू पुकारे और मैं सुन न पाऊँ ।

मैंने कब चाहा कि मेरी झोलियाँ ख़ुशी से भर दे
मैंने कब चाहा कि
मेरी झोलियाँ ख़ुशी से भर दे;
मगर किसी के आगे;
हाथ न फैलाना पड़े मेरे रब,
मेरी औकात बस इतनी कर दे।

मुझे क्या हक है
किसी को मतलबी कहूँ
मैं तो खुद अपने रब को
मुसीबतों में याद करता हूँ।

ईश्वर मेरे बिना भी ईश्वर है
मगर मैं ईश्वर के बिना कुछ भी नहीं।

प्रभु का रास्ता बड़ा सीधा है और बड़ा उलझा भी,
बुद्धि से चलो तो बहुत उलझा,
और भक्ति से चलो तो बड़ा सीधा,
विचार से चलो तो बहुत दूर,
और भाव से चलो तो बहुत पास
नजरो से देखो तो कण-कण मे,
और अंतर्मन से देखो तो जन-जन में.


धन कहता मुझे जमा कर
कैलेंडर कहता है मुझे पलट.
समय कहता है मुझे प्लान कर
भविष्य कहता है मुझे जीत.
सुंदरता कहती है मुझे प्यार कर
लेकिन
भगवान साधारण शब्दों में कहते हैं…
मुझ पर विश्वास कर ।


सुकून उतना ही देना प्रभु,
जितने से जिंदगी चल जाए,
औकात बस इतनी देना, कि
औरों का भला हो जाए,
रिश्तों में गहराई इतनी हो, कि
प्यार से निभ जाए,
आँखों में शर्म इतनी देना, कि
बुजुर्गों का मान रख पायें,
साँसे पिंजर में इतनी हों, कि
बस नेक काम कर जाएँ,
बाकी उम्र ले लेना, कि
औरों पर बोझ न बन जाएँ ।

 

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