अनमोल वचन

माँ बाप की आशीष

माँ बाप स्टेटस, मदर्स डे, पैरेन्टस डे, माता पिता पर अनमोल वचन

वो खुशनसीब होते हैं
माँ-बाप जिनके साथ होते हैं
क्योंकि
माँ बाप की आशीष के
हज़ारों हाथ होते हैं
माँ बाप की कमी को कोई पाट नहीं सकता
ईश्वर भी इनकी आशीषों को काट नहीं सकता।

माँ सोचती है, बेटा आज भूखा ना रहे,
और पिता सोचता है कि बेटा कल भूखा ना रहे..
बस यही वजह है कि ये दो सम्बन्ध ऐसे हैं संसार में,
जिनका दर्जा भगवान के बराबर है ।

मुफ्त में तो केवल
माँ बाप का प्यार मिलता है
बाकी हरेक रिश्ते की
कीमत चुकानी पड़ती है।

जब तक आदमी को;
एहसास होता है कि उसके पिता सही थे;
तब उसका एक बेटा होता है;
जो सोचता है उसके पिता गलत हैं ।

जैसे जैसे उम्र गुजरती है
एहसास होने लगता है कि
माँ बाप हर चीज़ के बारे में
सही कहते थे।

फूल कभी दो बार नहीं खिलते,
जन्म कभी दो बार नहीं मिलता,
मिलने को तो हज़ारों लोग मिल जाते हैं
पर हजारों गलतियां माफ़ करने वाले
माँ बाप नहीं मिलते।

कहते हैं कि पहला प्यार कभी भुलाया नहीं जाता
फिर पता नहीं लोग क्यों
अपने माँ -बाप का प्यार क्यों भूल जाते हैं ।

कड़वा सच,माता पिता की नसीहत
सबको बुरी लगती है लेकिन माता-पिता की वसीयत
सबको अच्छी लगती है.

शौक तो माँ-बाप के पैसों से पूरे होते हैं,
अपने पैसों से तो बस जरूरतें पूरी होती हैं ।

जिस दिन तुम्हारे कारण माँ-बाप की आँखों में आँसू आते है,
याद रखना… उस दिन तुम्हारा किया सारा धर्म-कर्म आँसुओं में बह जाता है।

………….एक पिता की व्यथा………………….

माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो !
’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !
मैंने भी मन में जज़्बातों के तूफान समेटे हैं,
ज़ाहिर नही किया, न सोचो पापा के दिल में प्यार न हो ।

थी मेरी ये ज़िम्मेदारी घर में कोई मायूस न हो,
मैं सारी तकलीफें झेलूँ और तुम सब महफूज़ रहो,
सारी खुशियाँ तुम्हें दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
मेरे बचपन में थी जो कमियाँ, वो तुमको महसूस न हों ।

है समाज का नियम भी ऐसा पिता सदा गम्भीर रहे,
मन में भाव छुपे हो लाखों, आँखो से न नीर बहे ।
करे बात भी रुखी-सूखी, बोले बस बोल हिदायत के,
दिल मे प्यार है माँ जैसा ही, किंतु अलग तस्वीर रहे ।

भूली नही मुझे है अब तक, तुतलाती मीठी बोली,
पल-पल बढ़ते हर पल में, जो यादो की मिश्री घोली,
कन्धों पे वो बैठ के जलता रावण देख के खुश होना,
होली और दीवाली पर तुम बच्चों की अल्हड़ टोली!

माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना,
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो भाव नयन में थम जाना,
बढ़ते कदम लड़कपन को कुछ मेरे मन की आशंका,
पर विश्वास तुम्हारा देख मन का दूर वहम जाना।

कॉलेज के अंतिम उत्सव में मेरा शामिल न हो पाना,
ट्रेन हुई आँखो से ओझल, पर हाथ देर तक फहराना,
दूर गये तुम अब, तो इन यादों से दिल बहलाता हूँ,
तारीखें ही देखता हूँ बस, कब होगा अब घर आना।

अब के जब तुम घर आओगे, प्यार मेरा दिखलाऊँगा,
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ, तुमको ये बतलाऊँगा,
आकर फिर तुम चले गये, बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही है, फिर खुद को समझाऊँगा ।

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