सुविचार

इन्सान की समझ

इंसान की समझ सिर्फ इतनी है
जानवर कहो तो नाराज हो जाती है
और
शेर कहो तो खुश हो जाती है।

इंसान न कुछ हँस कर सीखता है

इंसान न कुछ हँसकर सीखता है,
न कुछ रोकर सीखता है,
जब भी कभी अलग सीखता है तो,
या तो किसी का होकर सीखता है,
या किसी को खोकर सीखता है ।

इंसान की समझ - शाम सूरज को

शाम सूरज को ढलना सिखाती है;
शमा परवाने को जलना सिखाती है;
गिरने वालो को तकलीफ़ तो होती है;
पर ठोकर ही इंसान को चलना सिखाती है।

अच्छे विकल्प देने पर भी लोग;
प्रायः नहीं बदलते,
लोग प्रायः तभी बदलते हैं;
जब उनके पास कोई विकल्प नहीं होता ।

सभी कुछ तो हो रहा है
इस तरक्की के जमाने में
मगर यह क्या गज़ब है
आदमी इंसान नहीं होता ।

अगर इंसान की पहचान करनी हो

अगर इंसान की पहचान करनी हो तो
सूरत से नहीं सीरत से करो
क्योंकि सोना अक्सर
लोहे के ताले में ही रखा होता है ।

इंसान की पहचान,
दो बातों से होती है ।
एक;
उसका किया हुआ सब्र;
जब उसके पास कुछ न हो,
और दूसरा;
उसका रवैया,
जब उसके पास सब कुछ हो ।

‘कर्मों’ से ही पहचान होती है इन्सानों की;
महँगे ‘कपड़े’ तो,’पुतले’ भी पहनते हैं दुकानों में ।

डूबता है तो पानी को दोष देता है

डूबता है तो पानी को दोष देता है;
गिरता है तो पत्थर को दोष देता है;
इंसान भी बड़ा अजीब है;
कुछ नहीं कर पाता तो किस्मत को दोष देता है।

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