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soch ko apni le jao shikhar tak

सोच को ले जाओ शिखर तक


सोच को अपनी ले जाओ शिखर तक
कि उसके आगे सारे सितारे झुक जाएँ
न बनाओ अपने सफ़र को किसी कश्ती का मोहताज
चलो इस शान से कि तूफ़ान भी झुक जाये.

ये सोच है हम इन्सानों की,
कि एक अकेला क्या कर सकता है;
पर देख ज़रा उस सूरज को,
वो अकेला ही तो चमकता है ।

कोई नामुमकिन सी बात को;
मुमकिन करके दिखा ।
खुद पहचान लेगा ज़माना;
भीड़ में तू अलग चल कर दिखा ।

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