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प्रभु का दीदार

प्रभु का दीदार – प्रार्थना

मन की आँखों से;
प्रभु का दीदार करो;
दो पल का है अन्धेरा;
बस सुबह का इन्तजार करो;
क्या रखा है;
आपस के बैर में ए यारो;
छोटी सी है ज़िंदगी बस,
हर किसी से प्यार करो ।

मुझे तैरने दे या फिर बहना सिखा दे,
अपनी रजा में अब तू रहना सिखा दे,
मुझे शिकवा न हो कभी भी किसी से,
हे ईश्वर !
मुझे सुःख और दुःख के पार जीना सिखा दे।

पता नहीं कैसे परखता है;
मुझे मेरा ईश्वर,
इम्तिहान भी मुश्किल लेता है;
और फ़ेल भी नहीं होने देता ।
ज़माना जब भी मुझे
मुश्किल में डाल देता है
मेरा रब
हजारों रास्ते निकाल देता है ।

इतनी मेहरवानी मेरे ईश्वरबनाये रखना।
जो रास्ता सही हो उसी पर
चलाये रखना।
न दिल दुखे किसी का
मेरे शब्दों से,
इतना रहम तू मेरे भगवानमुझे पे बनाये रखना ।

पकड़ लो हाथ मेरा प्रभु ,
जगत में भीड़ भारी है
कहीं मैं खो न जाऊँ ,
ज़िम्मेदारी ये तुम्हारी है ।

दुनिया से बात करने के लिये;
फोन की जरूरत होती है;
और;
प्रभु  से बात करने के लिये
मौन की जरूरत होती है ।
फोन से बात करने पर;
बिल देना पड़ता है ,
और;
ईश्वर से बात करने पर;
दिल देना पड़ता है ।

हम न बोलें फिर भी;
वह सुन लेता है,
इसीलिये उसका नाम;
परमात्मा है ।
वह न बोले;
फिर भी हमें सुनायी दे,
उसी का नाम श्रद्धा है ।

घर से जब भी बाहर जाये;
तो घर में विराजमान अपने प्रभु से;
जरूर मिलकर जाएँ;
और जब लौट कर आएँ तो;
उनसे जरूर मिलें क्योंकि;
उनको भी आपके घर लौटने का इंतजार रहता है ।
“घर” में यह नियम बनाइए कि
जब भी आप घर से बाहर निकले तो
घर में मंदिर के पास दो घड़ी खड़े रह कर
“प्रभु चलिए..आपको साथ में रहना है”
ऐसा बोल कर ही निकले
क्योंकि आप भले ही
लाखों की घड़ी
हाथ में क्यों न पहने हों पर
समय तो “प्रभु के ही हाथ” में हैं ।

तेज स्वर में की गई प्रार्थना,
ईश्वर तक पहुँचे यह आवश्यक नहीं है,
किन्तु सच्चे मन से की गई प्रार्थना,
जो भले ही मौन रहकर की गई हो,
वह ईश्वर तक अवश्य पहुँचती है ।

हे प्रभु;
न मैंने तुझको देखा,
न कभी हम मिले;
फिर ऐसा क्या रिश्ता है,
दर्द कोई भी हो;
याद तेरी ही आती है ।

सुकून उतना ही देना प्रभु,
जितने से जिंदगी चल जाए,
औकात बस इतनी देना,
कि औरों का भला हो जाए,
रिश्तों में गहराई इतनी हो,
कि प्यार से निभ जाए,
आँखों में शर्म इतनी देना,
कि बुजुर्गों का मान रख पायें,
साँसे पिंजर में इतनी हों,
कि बस नेक काम कर जाएँ,
बाकी उम्र ले लेना,
कि औरों पर बोझ न बन जाएँ ।


‘परमात्मा’ शब्द नहीं;
जो तुम्हें पुस्तक में मिलेगा ।
‘परमात्मा’ मूर्ति नहीं;
जो तुम्हें मंदिर में मिलेगी ।
‘परमात्मा’ मनुष्य नहीं;
जाे तुम्हें समाज में मिलेगा ।
‘परमात्मा’ जीवन है;
जो तुम्हें अपने भीतर मिलेगा ।

जब आप हमारी ‘शंका’ दूर करते हैं,
तब आप “शंकर” लगते हैं।
जब ‘मोह’ दूर करते हैं तो
“मोहन” लगते हैं।
जब ‘विष’ दूर करते हैं तो
“विष्णु ” लगते हैं।
जब ‘भ्रम’ दूर करते हैं तो
“ब्रह्मा” लगते हैं।
जब ‘दुर्गति’ दूर करते हैं तो
“दुर्गा” लगते हैं।
जब ‘गुरूर’ दूर करते हैं तो
“गुरूजी” लगते हैं।

प्रार्थना ऐसे करो
जैसे सब कुछ
भगवान पर
निर्भर करता है
और कोशिश
ऐसीे करो कि
जैसे सब कुछ
खुद पर निर्भर है ।

हमारी आस्था की
सबसे बड़ी परीक्षा
तब होती है,
जब हम जो चाहें
वो न मिले और फिर भी
हमारे दिल से प्रभु के लिए
शुक्रिया ही निकले ।

प्रार्थना कुछ मांगने के लिए नहीं;
बल्कि ईश्वर ने जो कुछ दिया है;
उसके लिए उसका आभार;
व्यक्त करने के लिए होना चाहिए।

खोजा बहुत खुदा को
पर कहीं मिला नहीं
न मंदिर में न मस्जिद में,
न चर्च में न गुरुद्वारे में
तब किसी फ़कीर ने कहा
खुदा खोजने से नहीं
खुद को खो देने से मिलता है ।


“भक्ति” हाथ पैरों से नहीं होती है,
वर्ना दिव्यांग कभी नहीं कर पाते।
“भक्ति” न ही आँखों से होती है।
वर्ना सूरदास जी कभी नहीं कर पाते।
न ही भक्ति बोलने सुनने से होती है।
वर्ना “गूँगे-बहरे” कभी नहीं कर पाते।
न ही “भक्ति” धन और ताकत से होती है,
वर्ना गरीब और कमजोर कभी नहीं कर पाते ।
“भक्ति” केवल भाव से होती है,
यह एक अहसास है,
जो हृदय से होकर विचारों में आता है ।


भक्ति जब भोजन में प्रवेश करती है,
भोजन ” प्रसाद “बन जाता है ।
भक्ति जब भूख में प्रवेश करती है,
भूख ” व्रत ” बन जाती है ।
भक्ति जब पानी में प्रवेश करती है,
पानी ” चरणामृत ” बन जाता है ।
भक्ति जब सफर में प्रवेश करती है,
सफर ” तीर्थयात्रा ” बन जाता है ।
भक्ति जब संगीत में प्रवेश करती है,
संगीत ” कीर्तन ” बन जाता है ।
भक्ति जब घर में प्रवेश करती है,
घर ” मन्दिर ” बन जाता है ।
भक्ति जब कार्य में प्रवेश करती है,
कार्य ” कर्म ” बन जाता है ।
भक्ति जब क्रिया में प्रवेश करती है,
क्रिया “सेवा ” बन जाती है ।
और…
भक्ति जब व्यक्ति में प्रवेश करती है,
व्यक्ति ” मानव ” बन जाता है ।

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मैं हर बार आजमाता हूँ
प्रीत की डोरी टूटने न देना
इतनी कृपा बनाये रखना
राह दे कृष्ण
सब तुम्हारा है तुम सबके हो
उसका नाम दुनिया है
औकात से बढ़ कर
रब की मेहरबानी
प्रभु को मौन पाते हैं
पलकें झुकें और नमन हो जाये
तलाश न कर मुझे
अगला कदम पहचान सकूं
तू पुकारे और मैं सुन न पाऊँ
तू मिलता सिर्फ उन्ही को है
कोई कहे ये तेरा है 
कोई तो है जो फैसला करता है