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कलश स्थापना एवं पूजन
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कलश स्थापना एवं पूजन – नवरात्रि प्रथम दिन

कलश स्थापना एवं पूजन – (Kalash Sthapna) :

  • नवरात्र के पहले दिन कलश की स्थापना के साथ माँ दुर्गा के पहले स्वरूप ‘शैलपुत्री’ की पूजा होती है।
  • नव दुर्गा का यह स्वरूप दाएँ हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प लिए हुये वृषभ पर आरुड़ होता है ।
  • अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई  थीं तब इनका नाम ‘सती’ था।
  • पर्वतराज हिमालय के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था । इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था।
  • भगवान शंकर आदि देव माने जाते हैं, अतः शैलपुत्री को नव दुर्गा में प्रथम स्थान मिला ।
  • दुर्गा पूजा का त्यौहार वर्ष में दो बार एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में आता है ।
  • दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही है, दोनों ही प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मनायी जाती है ।

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कलश स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ (Important Things for Kalash Sthapna):

  • मिट्टी का पात्र और जौ
  • शुद्ध साफ की हुई मिट्टी
  • शुद्ध जल से भरा हुआ सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का कलश
  • मोली (लाल सूत्र)
  • साबुत सुपारी
  • कलश में रखने के लिए सिक्के
  • अशोक या आम के 5 पत्ते
  • कलश को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन
  • साबुत चावल
  • एक पानी वाला नारियल
  • लाल कपड़ा या चुनरी
  • फूल से बनी हुई माला

घट-स्थापना या कलश स्थापना :

भविष्य पुराण के अनुसार

  • कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को शुद्ध कर लेना चाहिए।
  • एक लकड़ी की चौकी रखकर उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाना चाहिए। इस कपड़े पर थोड़ा चावल रखना चाहिए।
  • चावल रखते हुए सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करना चाहिए ।
  • एक मिट्टी के पात्र में सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं  ।
  • इस पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करना चाहिए। कलश पर रोली से स्वस्तिक या ॐ बनाना चाहिए ।
  • कलश के मुख पर रक्षा सूत्र बांधना चाहिए। कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रखने चाहिए।
  • कलश के मुख को ढक्कन से ढंक देना चाहिए। ढक्कन पर चावल भर देना चाहिए।
  • एक नारियल ले उस पर चुनरी लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए।
  • सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित कर कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थना की जाती है ।
  • कलश के पास एक अखंड दीप-ज्योति की स्थापना का भी विधान है यानी नवरात्र के दौरान यह दीपक कभी बुझता नहीं है।
  • नवरात्र पर कलश स्थापना या घट-स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है ।

पूजन :

  • नवरात्रि में आराधना का विशेष महत्व है। इस समय के तप का फल कई गुना व शीघ्र मिलता है।
  • इस फल के कारण ही इसे कामदूधा काल भी कहा जाता है।
  • नवरात्र के नौ दिन प्रात:, मध्याह्न और संध्या के समय भगवती दुर्गा की पूजा करनी चाहिए।
  • श्रद्धानुसार अष्टमी या नवमी के दिन हवन और कुमारी पूजा कर भगवती को प्रसन्न करना चाहिए।

देवी की सहस्त्र नामावली से अर्चन :

अर्चन के पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें –

  • देवी की सहस्त्र नामावली में देवी के गुण और कार्य के अनुसार उनके एक हजार नामों की सूची है।
  • यह नामावली, बाज़ार में आसानी से मिल जाती है, जिसके एक-एक नाम का उच्चारण करके अर्चन करना चाहिए ।
  • अर्चन के पूर्व पुष्प, धूप, दीपक व नैवेद्य लगाना चाहिए।
  • दीपक इस तरह होना चाहिए कि पूरी अर्चन प्रक्रिया तक प्रज्वलित रहे।
  • जिस वस्तु से अर्चन करना हो वह शुद्ध, पवित्र, दोष रहित व एक हजार होना चाहिए।
  • अर्चनकर्ता को स्नानादि आदि से शुद्ध होकर धुले कपड़े पहनकर मौन रहकर अर्चन करना चाहिए।
  • साधना पूर्ण होने के पूर्व आसन का त्याग किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए।
  • देवी के प्रत्येक नाम के उच्चारण के पश्चात नमः बोलकर देवी की प्रिय वस्तु चढ़ाना चाहिए ।
  • अर्चन में बिल्वपत्र, हल्दी, केसर या कुमकुम से रंगे चावल प्रयोग करना चाहिए ।
  • इलायची, लौंग, काजू, पिस्ता, बादाम, गुलाब के फूल की पंखुड़ी, मोगरे का फूल, चारौली, किसमिस, सिक्का आदि का प्रयोग शुभ व देवी को प्रिय है।
  • नवरात्र में “श्री दुर्गा सप्तशती” का पाठ करने का प्रयास करना चाहिए।
  • मां दुर्गा की पूजा के लिए लाल रंग के फूलों व रंग का अत्यधिक प्रयोग करना चाहिए।

एक से अधिक व्यक्ति होने पर अर्चन  –

  • यदि अर्चन एक से अधिक व्यक्ति एक साथ करें तो नाम का उच्चारण एक व्यक्ति को तथा अन्य व्यक्तियों को नमः का उच्चारण अवश्य करना चाहिए। अर्चन की सामग्री प्रत्येक नाम के पश्चात, प्रत्येक व्यक्ति को अर्पित करना चाहिए।
  • कुमकुम से भी अर्चन किए जा सकते हैं। इसमें नमः के पश्चात बहुत थोड़ा कुमकुम देवी पर अनामिका-मध्यमा व अंगूठे का उपयोग करके चुटकी से चढ़ाना चाहिए।
  • बाद में उस कुमकुम से स्वयं को या मित्र भक्तों को तिलक के लिए प्रसाद के रूप में दे सकते हैं।
  • अर्चन के उपयोग में प्रयुक्त सामग्री अर्चन उपरांत किसी साधन, ब्राह्मण, मंदिर में देना चाहिए।
  • सहस्त्रार्चन नवरात्र काल में एक बार कम से कम अवश्य करना चाहिए।
  • अर्चन प्रयोग बहुत प्रभावशाली, सात्विक व सिद्धिदायक होने से इसे पूर्ण श्रद्धा व विश्वास से करना चाहिए।
  • आपकी आराध्य देवी का अर्चन अधिक लाभकारी है।

हवन और कन्या पूजन :

  • नवरात्र में हवन और कन्या पूजन अवश्य करना चाहिए।
  • नारदपुराण के अनुसार हवन और कन्या पूजन के बिना नवरात्र की पूजा अधूरी मानी जाती है।
  • सहस्त्रनाम के पाठ करने का फल भी महत्वपूर्ण है। इन नामों से हवन करने का भी विधान है। इसके अंतर्गत नाम के पश्चात नमः लगाकर स्वाहा लगाया जाता है।
  • हवन की सामग्री के अनुसार उस फल की प्राप्ति होती है। सर्व कल्याण व कामना पूर्ति हेतु इन नामों से अर्चन करने का प्रयोग अत्यधिक प्रभावशाली है।

धार्मिक मान्यता

  • जौ और सप्त अनाज के अंकुरण दशमी तिथि तक काफी बढ़ जाते हैं उन्हें दशमी को काट लिया जाता है ।
  • इन्हे जयंती या जंत्री भी कहा जाता है ।
  • जयंती दशमी के दिन मंत्र “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नमोस्तुते” के साथ सभी देवी-देवता को अर्पित की जाती है  ।
  • इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं ।

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