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manzil par pahuchna ho - मंजिल पर

मंजिल पर पहुँचना हो तो ..!


मंजिल पर पहुँचना हो तो
राह के काँटों से मत घबराना
क्योंकि काँटे ही बड़ा देते हैं
रफ़्तार क़दमों की।

agar pana hai manzil

अगर पाना है मंजिल
तो अपना रहनुमा खुद बनो
वो अक्सर भटक जाते हैं
जिन्हें सहारा मिल जाता है।

मंज़िल पाना तो बहुत दूर की बात हैं।
गुरूर में रहोगे तो रास्ते भी न देख पाओगे।

चलता रहूँगा मै पथ पर, चलने में माहिर बन जाऊँगा,
या तो मंज़िल मिल जायेगी, या मुसाफिर बन जाऊँगा।

अंदाज़ कुछ अलग ही है मेरे सोचने का,
सब को मंज़िल का शौक़ है, मुझे रास्ते का ।

मंज़िल पर - रास्ते कहाँ ख़त्म होते हैं

रास्ते कहाँ ख़त्म होते हैं
ज़िंदग़ी के सफ़र में,
मंज़िल तो वहाँ है
जहाँ ख्वाहिशें थम जाएँ।

हार को मन का नहीं मंज़िल का सबक बना - मंज़िल पर

हार को मन का नहीं
मंज़िल का सबक बना
जिन्दगी अकसर उलझती है
जब राहें मंजिल के करीब हो।

अभी ना पूछो मंज़िल कहाँ है,
अभी तो हमने चलने का इरादा किया है।
न हारे हैं न हारेंगे कभी,
ये खुद से वादा किया है।

मुश्किलें जरुर हैं,
मगर ठहरा नही हूँ मैं
मंज़िल से जरा कह दो,
अभी पहुंचा नही हूँ मैं।

manzil chahe kitni - मंज़िल पर

मंजिल चाहे;
कितनी भी;
ऊँची क्यों न हो,
रास्ता हमेशा;
पैरों के;
नीचे ही होता है ।

ज़रा ठहरो
हमें भी साथ ले लो कारवाँ वालो
अगर तुम से
न पहचानी गई मंज़िल तो क्या होगा।

मंज़िलों से गुमराह भी कर दिया करते हैं
कुछ लोग
हर किसी से रास्ता पूछना
अच्छा नहीं होता।

मंजिल मिले न मिले
ये तो मुकद्दर की बात है
हम कोशिश भी न करें
ये तो गलत बात है
सड़क कितनी भी साफ हो
“धूल” तो हो ही जाती है
इंसान कितना भी अच्छा हो
“भूल” तो हो ही जाती है।

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