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Bol Meethe Na Ho

बोल मीठे न हों तो

बोल मीठे न हों तो हिचकियाँ भी नहीं आतीं;
कीमती मोबाइलों पर घंटियाँ भी नहीं आती;
घर बड़ा हो या छोटा, गर मिठास न हो तो;
इंसान तो क्या चीटियाँ भी नहीं आतीं ।

मीठे बोल बोलिए;
क्योंकि;
अल्फाजों में जान होती है,
इन्हीं से आरती, अरदास और अजान होती है,
ये दिल के समंदर के वो मोती हैं,
जिनसे इंसान की पहचान होती है ।



बोलने से ही हम जाने जाते हैं और बोलने से ही हम विख्यात या कुख्‍यात भी हो सकते हैं। उतना ही बोलना चाहिए जितने से जीवन चल सकता है। व्यर्थ बोलते रहने का कोई मतलब नहीं। भाषण या उपदेश देने से श्रेष्ठ है कि हम बोधपूर्ण जीवन जीकर उचित कार्य करें।

मनुष्य को वाक क्षमता मिली है तो वह उसका दुरुपयोग भी करता है, जैसे कि कड़वे वचन कहना, श्राप देना, झूठ बोलना या ऐसी बातें कहना जिससे कि भ्रमपूर्ण स्थिति का निर्माण होकर देश, समाज, परिवार, संस्थान और धर्म की प्रतिष्ठा गिरती हो।

चूडियों का व्यापारी, एक गधी पर चूडियां लाद कर बेचा करता था। एक बार किसी एक गांव से दूसरे गांव जाते हुए रास्ते में बोलता जा रहा था, ‘चल मेरी माँ, तेज चल’।’चल मेरी बहन,जरा तेज चल’। साथ चल रहे राहगीर नें जब यह सुना तो पूछे बिना न रह पाया। “मित्र तुम इस गधी को क्यों माँ बहन कहकर सम्बोधित कर रहे हो?”
चूडियों वाले ने उत्तर दिया, “भाई मेरा व्यवसाय ही ऐसा है, मुझे दिन भर महिलाओं से ही वाणी-व्यवहार करना पडता है। यदि मैं इस जबान को जरा भी अपशब्द के अनुकूल बनाउं तो मेरा धंधा ही चौपट हो जाय। मैं तो मात्र अपनी वाणी की परिशुद्धता के लिये, इस गधी को भी माँ-बहन कह, सम्बोधित करता हूं। इससे नारी उद्बोधन में मेरे वचन सजग रहते हुए पावन और सौम्य बने रहते है और मेरा मन भी पवित्रता से हर्षित रहता है।




और पढ़ें  – शब्दों का वजन बात वो करो

One comment

  1. Very nice status all

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