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ज़माना बड़ा ख़राब है

ज़माना बड़ा ख़राब है

तू छोड़ दे कोशिशें;
इन्सानों को पहचानने की !
यहाँ जरुरतों के हिसाब से;
सब बदलते नकाब हैं !
अपने गुनाहों पर;
सौ पर्दे डालकर,
हर शख़्स कहता है;
“ज़माना बड़ा ख़राब है”

ज़िन्दगी की हकीकत को
बस इतना ही जाना है !.
दर्द में अकेले हैं और
खुशियों में सारा जमाना है।

करेगा ज़माना भी
हमारी कदर एक दिन,
बस ये वफादारी की आदत
छूट जाने दो।

चाहतें
मेमने से भी भोली हैं,
पर ज़माना
कसाई से भी ज़ालिम है।

आता है याद मुझको, गुज़रा हुआ ज़माना,
वो बाग़ की बहारें, वो सबका चहचहाना,
आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना।

One comment

  1. Super.ji

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