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खामोशी

खामोशी का अपना अलग ही मजा है

खामोशी
का अपना
अलग ही मजा है,
पेड़ों की जड़ें
फड़फड़ाया नही करती ।

शोर की तो एक उम्र होती है
लेकिन ख़ामोशी सदाबहार है

कौन कहता है तन्हाइयाँ अच्छी नहीं होती
ये खुद से मिलने का हसीं मौका देती हैं ।

अंदाज से न नापिए
किसी की हस्ती को
ठहरे हुये दरिया
अक्सर गहरे होते हैं ।

खामोशी छुपाती है
ऐब और हुनर दोनों
शख्सियत का अंदाज़ा
गुफ्तगू से होता है ।

खामोशी पर;
मत जाओ साहब,
राख़ के नीचे अक्सर;
आग दबी होती है ।

चुप थे तो ज़िंदगी चल रही थी लाजवाब
खामोशियाँ बोलने लगी
तो हो गया बबाल ।

उस जगह पर खामोश रहना
जहाँ दो कौड़ी के लोग
अपनी हैसियत के गुण गाते हैं ।

जो बातें अनकही रह जाती हैं
वही अक्सर तन्हाइयों में बातें करती हैं ।

रुतबा तो ‘खामोशियों’ का
होता है,
अल्फ़ाज’ का क्या,
वो तो मुकर जाते हैं,
हालात देखकर ।

हजार जवाबों से अच्छी है खामोशी,
ना जाने कितने सवालों की आबरू रखती है ।

दस्तक और आवाज कानों का लिए है
जो रूह को सुनाई दे
उसे खामोशी कहते हैं ।

हर बात खामोशी से मान लेना
यह भी अंदाज़ होता है नाराजगी का ।

कौन कहता है खामोशियॉं खामोश होती हैं,
खामोशियों को खामोशी से सुनो;
क्या पता खामोशी वो कह दे;
जिसकी लफ्जों में तलाश हो ।

खामोशी हल नहीं है, मसलों का
गुफ्तगू हर दरवाजे खोल देती है ।

खामोशियॉं बेवजह नहीं होती
कुछ दर्द आवाज छीन लिया करते हैं ।

उसे लगता है कि मुझे
उसकी चालाकियॉं समझ नहीं आती
मैं बड़ी खामोशी से देखता हूँ उसे
अपनी नजरों से गिरते हुए ।

रुठी हुई खामोशी से
बोलती हुई शिकायतें अच्छी होती हैं ।

अलग अलग रंग में दिखती, नए नए ढंग में मिलती है ।
कभी दूर,कभी पास लाती, अपनों के रूठ जाने का भी अहसास कराती है ।
कभी ख्वाबों में जीना सिखाती, कभी ग़मों को पीना बताती है ।
तन्हाइयों में आशियाना बनाती, कभी भीड़ में भी विराना जताती है ।
कभी निगाहों से बोलती, कभी अपने दिल को टटोलती है ।
हर बेपरवाही सह जाती, चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाती है ।
अज़ीब है खामोशियाँ कमाल है खामोशियाँ ।
है कहीं ज़वाब तो कहीं सवाल है खामोशियाँ ।

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